आखिर क्यों इतने ग्रंथों में सिर्फ श्रीमद्भगवतगीता की ही जयन्ती मनायी जाती है ?

विश्व के किसी भी धर्म या सम्प्रदाय के किसी भी ग्रन्थ का जन्म-दिन नहीं मनाया जाता, जयन्ती मनायी जाती है तो केवल श्रीमद्भगवतगीता की क्योंकि अन्य ग्रन्थ किसी मनुष्य द्वारा लिखे या संकलित किये गये हैं जबकि गीता का जन्म स्वयं श्री भगवान के श्री मुख से हुआ है।

या स्वयं पद्मनाभस्य
मुखपद्याद्विनि सृता।।

अगहन (मार्गशीर्ष) मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी जिसे ‘मोक्षदा’ एकादशी कहा गया है तथा जो काल, धर्म, सम्प्रदाय जाति विशेष के लिये नहीं अपितु सम्पूर्ण मानव-जाति के लिये है। गीता ग्रन्थ में कहीं भी ‘श्रीकृष्ण उवाच’ शब्द नहीं आया है, बल्कि ‘‘श्री भगवानुवाच’’ का प्रयोग किया गया है। वेदों और उपनिषदों का सार के अलावा मनुष्य को इस लोक और परलोक दोनों में मंगलमय मार्ग दिखाने वाला गीता ग्रन्थ है। प्राय: कुछ ग्रन्थों में कुछ न कुछ सांसारिक विषय मिले रहे हैं, लेकिन श्रीमद्भगवतगीता का एक भी शब्द सदुपदेश से खाली नहीं है।
अर्जुन भयभीत है, युद्ध क्षेत्र में डटे स्वजनसमुदाय ताऊ-चाचों, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों और मित्रों को देखकर कहता है हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखों को ही। हे गोविन्द! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगों से और जीवन से भी क्या लाभ है? भय से व्याप्त अर्जुन अपने सगे संबंधियों को देखने के अलावा वह व्याख्या करता है कि हम कुटुम्बियों को मारकर वैसे सुखी होंगे। ये लोभ से भ्रष्ट चित्त है। लोभ में ये मित्रों से विरोध करने में पाप को भी नहीं देखते इससे अच्छा है कि, हम ही पाप को देखें। कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं, धर्म के नाश से कुल में पाप बढ़ जाता है, पाप बढ़ने से कुल की स्त्रियां दूषित हो जाती हैं और स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है। वर्णसंकर कुलधातियों और कुल को नरक में ले जाता है।

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं
प्रज्ञावादांश्र्च भाषा से।
गतासूनगतासूंश्र्च नानुशोचान्ति
पण्डिता।।

भगवान अर्जुन का भय दूर करते हुए कहते हैं तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिये शोक करता है और पण्डितों के से वचनों को कहता है परन्तु जिनके प्राण चले गये हैं उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये हैं उनके लिये भी पण्डितजन शोक नहीं करते हैं। संपूर्ण गीता में भगवान ने जीवन जीने की कला सिखायी है। वे सभी बिन्दुओं पर प्रकाश डालते हैं। वे निस्पृह भाव की सीख देते हैं, वे कर्म, योग, शांति, सभी योग तत्वों के साथ-साथ मोक्ष का मार्ग दिखलाते हैं। सार यही है कि योगेश्वर श्रीकृष्ण ने उपदेश दिया है कर्म करो, कर्म करना कर्तव्य है पर यह कर्म निष्काम भाव से होना चाहिए।

सुखदु:खे समे कृत्वा
लाभलाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं
पापमवाप्स्यसि।।

अर्थात् हम सब बड़े भाग्यवान् हैं कि हमें इस संसार के घोर अंधकार से भरे घने मार्गों में प्रकाश दिखाने वाला यह छोटा किन्तु अक्षय स्नेहपूर्ण धर्मदीप प्राप्त हुआ है।

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